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उत्तराखंड: कौन है तिमुंडिया वीर? जिनकी पूजा के बिना अधूरी है बद्रीनाथ धाम की यात्रा

उत्तराखंड: कौन है तिमुंडिया वीर? जिनकी पूजा के बिना अधूरी है बद्रीनाथ धाम की यात्रा

उत्तराखंड: कौन है तिमुंडिया वीर? जिनकी पूजा के बिना अधूरी है बद्रीनाथ धाम की यात्रा

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चमोली : देश और दुनिया से बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने देश-दुनिया से श्रद्धालु पहुंचते हैं। परिवार और अपनों के लिए कुशलक्षेम की प्रार्थना करते हैं। उन भगवान बदरीनाथ की यात्रा की कुशलता की गारंटी तिमुंडिया वीर देता है। श्री बदरीनाथ यात्रा की सफलता और कुशलता के लिए नृसिंह मंदिर जोशीमठ में तिमुंडिया मंदिर में पूजा संपन्न हुई।

पूजा-अर्चना के बाद तिमुंडिया वीर का आह्वान हुआ भरत बैंजवाड़ी पर पश्वा (अवतारी पुरूष) तिमुंडिया वीर जागृत हुआ उन्होंने पांच किलो से अधिक चावल-गुड़ कई घड़े पानी का भोग गृहण किया यह देखकर सभी श्रद्धालु अचंभित रह गये। पश्वा ने श्री बदरीविशाल यात्रा के निविघ्न शुरू होने का भी आशीर्वाद दिया। इस अवसर पर सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन को पहुंचे थे।

मान्यता है कि मां दुर्गा से स्थानीय लोगों ने तिमुंडिया के भय से बचाने की प्रार्थना की तो मां दुर्गा ने उसके तीन में से दो सिर काट दिये डर के मारे एक सिर का तिमुंडिया छमा याचनाकर मां दुर्गा की शरण में चला गया। मां दुर्गावती ने तिमुंडिया को क्षमा कर दिया वचन लिया कि तुम किसी भी आमजन को दु:खी नहीं करोगे।

बाद में मां दुर्गा ने आशीर्वाद दिया कि जब भी श्री बदरीनाथ धाम यात्रा शुरू होगी उससे पहले श्री नृसिंह मंदिर मठांगण में तिमुंडिया की पूजा की जायेगी इसी मान्यता के तहत हर वर्ष श्री बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने से पहले शनिवार को तिमुंडिया पूजा होती है।

पौराणिक दंत कथाओं के अनुसार तिमुंडिया वीर देवता जनपद चमोली के लांजी पोखनी के निकट के गांव हियूणा में राक्षस स्वरूप में रहते थे। वे नित्य एक ना एक मनुष्य की बलि लेकर गांव में भय फैलाता था। मान्यता है कि एक दिन जोशीमठ क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी मां दुर्गा अपने क्षेत्र भ्रमण पर निकली तो लोगों से उनकी भेंट हुई।

मां दुर्गा से ग्रामीणों ने अपना दुख साझा किया और इस राक्षस का कुछ उपाय करने को कहा उसके बाद मां दुर्गा ने इस राक्षस को राक्षसी योनि से मुक्त कर देवयोनि प्रदान की और अपने साथ अपने क्षेत्र जोशीमठ में इस आश्वासन पर ले आई की मां दुर्गा इस राक्षस को प्रतिवर्ष एक बकरे की बलि देगी और उसके बदले में यह राक्षस मां और मां के क्षेत्र की रक्षा करेगा। उस पौराणिक समय से तिमुंडिया को वीर देवता के नाम से पूजा जाने लगा और साल में एक बकरे की बलि आज भी दी जाती है।

पौराणिक समय से लेकर आज तक नरसिंह मंदिर में जब जब इस देव मेले का आयोजन होता है तब अवतारी पुरुष पर तिमुंडिया वीर का आवेश आने पर मात्र मां दुर्गा उसे काबू करने में सक्षम हैं। जब तिमुंडिया वीर के अवतारी पुरुष पर वीर का अवतरण होता है।

उससे कुछ मिनट पहले अवतारी पुरुष पर मां दुर्गा भी अवतरित होती हैं और इस वीर के बाल पकड़कर इसे काबू करती हैं। पौराणिक दंत कथाओं के अनुसार वीर की प्रवृत्ति आज भी अत्यंत डरावनी और तेजवान है और इस वीर को काबू करने में मात्र मां दुर्गा ही सक्षम है।

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