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साहित्यकार महावीर रवांल्टा की दो नई कृतियां प्रकाशित, “ज आम्म छांट नई” और “धुएं के बादल” पाठकों के बीच

साहित्यकार महावीर रवांल्टा की दो नई कृतियां प्रकाशित, “ज आम्म छांट नई” और “धुएं के बादल” पाठकों के बीच

देहरादून : उत्तराखंड की रवांल्टी बोली की माटी से उठी साहित्यिक खुशबू एक बार फिर पाठकों के दिलों तक पहुंच रही है। प्रख्यात साहित्यकार महाबीर रवांल्टा की दो नई कृतियां  रवांल्टी कविताओं का संग्रह “ज आम्म छांट नई” और लोककथा आधारित नाटक “धुएं के बादल” प्रकाशित हो चुकी हैं। ये दोनों रचनाएं रवांई अंचल की बोली, संस्कृति और संवेदनाओं का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करती हैं।

“ज आम्म छांट नई”: कविताओं में रवांल्टी की आत्मा

“ज आम्म छांट नई” रवांल्टी बोली में रचित कविताओं का एक अनमोल संग्रह है, जिसमें हिन्दी अनुवाद भी शामिल है ताकि यह बोली और इसकी भावनाएँ व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँच सकें। इस पुस्तक का आवरण प्रसिद्ध चित्रकार शशिभूषण बडोनी की कला से सजा है, और इसकी कीमत ₹120.00 निर्धारित की गई है। यह संग्रह रवांई की मिट्टी, पहाड़ों और वहाँ के जीवन की कहानी को काव्यात्मक रूप में पेश करता है।

“धुएँ के बादल”: लोककथा का नाटकीय रूप

दूसरी कृति “धुएँ के बादल” रवांई की प्रसिद्ध लोककथा “बदला” पर आधारित एक प्रभावशाली नाटक है। इसकी सशक्त कहानी और रवांल्टी बोली का जीवंत प्रयोग इसे अनूठा बनाता है। पुस्तक का आवरण सुप्रसिद्ध कलाकार मुकुल बडोनी के चित्र से सुसज्जित है, और इसकी कीमत ₹125.00 रखी गई है। यह नाटक रवांई की लोकसंस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है।

लेखक की जुबानी

महाबीर रवांल्टा ने कहा, “ये कृतियाँ मेरे लिए केवल किताबें नहीं, बल्कि रवांई की भाषा, संस्कृति और पहचान को जीवित रखने का प्रयास हैं। मैं चाहता हूँ कि हमारी बोली और लोककथाएँ नई पीढ़ियों तक पहुँचें और उनकी गंध हमेशा बनी रहे।”

कौन हैं महाबीर रवांल्टा?

उत्तरकाशी के सरनौल गांव में जन्मे महाबीर रवांल्टा उत्तराखंड के एक बहुमुखी रचनाकार हैं। कवि, कथाकार, नाटककार और लोकसंस्कृति के शोधकर्ता के रूप में पिछले तीन दशकों से वे रवांल्टी बोली और लोककथाओं को सहेजने में जुटे हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में 4 उपन्यास, 11 कहानी संग्रह, 4 कविता संग्रह, 4 नाटक, बाल साहित्य और रवांल्टी लोककथाओं का दस्तावेज़ीकरण शामिल है। उनकी कुछ चर्चित कृतियाँ हैं  “टुकड़ा-टुकड़ा यथार्थ”, “सफेद घोड़े का सवार”, “आखिरी पहर की कहानी” और “ढोल की थाप”। वर्ष 2021 में उन्हें उत्तराखंड भाषा संस्थान का सदस्य नामित किया गया था।

रवांल्टी बोली का बढ़ता स्वर

रवांई की पहाड़ियों से निकलकर रवांल्टी बोली अब देहरादून, दिल्ली और अन्य शहरों तक अपनी पहचान बना रही है। महाबीर रवांल्टा की ये नई कृतियाँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि रवांई की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने का एक अनमोल प्रयास भी हैं। जैसा कि लेखक कहते हैं, “धुएँ के बादल छँट भी जाएँ, उनकी गंध नहीं मिटती; यही रवांल्टी शब्दों की ताकत है, जो पीढ़ियों तक बनी रहती है।”

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