
सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के कामकाज पर सुनवाई, याचिकाकर्ताओं को 10 दिन में देना होगा जवाब
नई दिल्ली। भारतीय निर्वाचन आयोग के कामकाज और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर कथित तौर पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों से जुड़ी याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। अदालत ने इंडिया ब्लॉक समेत सभी याचिकाकर्ताओं को निर्वाचन आयोग की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे पर 10 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई नवंबर के दूसरे सप्ताह में होगी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं से आयोग के जवाब पर अपना पक्ष रखने को कहा। इन याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के बहुसदस्यीय ढांचे में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसले अन्य दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों के बावजूद लिए गए।
चुनाव आयोग ने आरोपों को किया खारिज
निर्वाचन आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल कर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज किया। आयोग ने अपने जवाब में कहा कि एसआईआर से संबंधित सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने इस दावे को भी गलत बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की असहमति के बावजूद अकेले निर्णय लिए।
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम शामिल किए जाने से संबंधित अपीलों के मुद्दे पर आयोग ने बताया कि राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अधिकारियों की ओर से 16.10 लाख अपीलें दाखिल की गईं। आयोग ने इस प्रक्रिया के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व आदेशों का भी हवाला दिया है।
14 फैसलों पर असहमति का दावा
याचिकाकर्ताओं ने अपनी दलीलों में उन खबरों का हवाला दिया है, जिनमें निर्वाचन आयोग के भीतर निर्णयों को लेकर मतभेद होने का दावा किया गया था। याचिकाओं के अनुसार, अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने एसआईआर से जुड़े विभिन्न कदमों पर कथित तौर पर कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि निर्वाचन आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है, इसलिए उसके निर्णयों की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। उनका आग्रह है कि यह स्पष्ट किया जाए कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना आयोग की ओर से फैसले ले सकते हैं।
हालांकि, इन आरोपों पर निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में सभी संबंधित निर्णयों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है। ऐसे में मामले की अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के प्रत्युत्तर और आयोग के पक्ष पर चर्चा होने की संभावना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने की मांग
राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर एक याचिका में निर्वाचन आयोग के मूल रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि विवादित फैसले संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप लिए गए थे या नहीं।
याचिकाकर्ता ने अंतरिम राहत के तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की मांग भी की है। याचिका में आयोग की निर्णय प्रक्रिया और कथित असहमतियों से जुड़े दस्तावेजों की जांच पर जोर दिया गया है।
14 फैसलों को रद्द करने और स्वतंत्र जांच की मांग
अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से दायर एक अन्य याचिका में कथित तौर पर एकतरफा लिए गए 14 फैसलों को रद्द करने की मांग की गई है। इसके साथ ही मामले की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में जांच आयोग या विशेष जांच दल गठित करने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में साइबर सुरक्षा और सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों को भी जांच प्रक्रिया में शामिल करने की मांग की गई है, ताकि संबंधित निर्णयों और उनसे जुड़े रिकॉर्ड की तकनीकी जांच की जा सके।
राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने भी उठाए सवाल
राहुल गांधी और इंडिया ब्लॉक के अन्य नेताओं की ओर से भी निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर संयुक्त याचिका दायर की गई है। इन याचिकाओं में आयोग के बहुसदस्यीय स्वरूप और निर्णय लेने के अधिकारों को लेकर स्पष्टता की मांग की गई है।
मामले का प्रमुख सवाल यह है कि निर्वाचन आयोग जैसे संवैधानिक निकाय में फैसले लेने की प्रक्रिया किस तरह संचालित होनी चाहिए और यदि किसी निर्णय पर सदस्यों के बीच मतभेद हों, तो उनकी जांच किस प्रकार की जाए।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्वाचन आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई नवंबर के दूसरे सप्ताह में प्रस्तावित है। उस दौरान आयोग के जवाब और याचिकाकर्ताओं के प्रत्युत्तर के आधार पर आगे की कानूनी कार्यवाही बढ़ सकती है।

