
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने मेला प्राधिकरण को भेजा कानूनी नोटिस, बताया सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का दुरुपयोग, कानूनी कार्रवाई की चेतावनी
प्रयागराज: ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने प्रयागराज मेला प्राधिकरण के एक नोटिस के खिलाफ कड़ी कानूनी प्रतिक्रिया दी है। उनके वकील अनजनी कुमार मिश्रा ने 20 जनवरी 2026 को जारी एक पत्र में नोटिस को गैर-कानूनी, मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए इसे 24 घंटे में वापस लेने की मांग की है। नोटिस वापस न लेने पर अवमानना, मानहानि और अन्य कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। यह विवाद माघ मेला शिविर से जुड़ा है, जहां प्राधिकरण ने देर रात नोटिस चिपकाया था।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के वकील ने पत्र में कहा है कि प्राधिकरण का 19 जनवरी 2026 का नोटिस (संख्या 4907/15- Μ. Κ.Μ. (2025-26)) बिना अधिकार क्षेत्र के जारी किया गया है और इसका उद्देश्य उनके मुवक्किल को अपमानित करना तथा सनातन धर्म के करोड़ों अनुयायियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना है। पत्र में दावा किया गया है कि यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का गलत इस्तेमाल कर जारी किया गया, जो अवमानना का मामला बनता है।
पृष्ठभूमि और उत्तराधिकार का विवाद
पत्र में विस्तार से बताया गया है कि पूर्व ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज 11 सितंबर 2022 को ब्रह्मलीन हुए थे। उन्होंने अपनी पंजीकृत वसीयत (दिनांक 1 फरवरी 2017) और घोषणा-पत्र (दिनांक 1 जुलाई 2021) में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ का उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। 12 सितंबर 2022 को मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के परमहंसी गंगा आश्रम में लाखों लोगों की उपस्थिति में अभिषेक, तिलक और पट्टाभिषेक के साथ उनकी स्थापना हुई। इस समारोह में शारदा मठ द्वारका के लिए स्वामी सदानंद सरस्वती की भी स्थापना हुई, जिसमें श्रींगेरी पीठ के प्रतिनिधि मौजूद थे।
वकील ने जोर दिया कि यह नियुक्ति शास्त्रों, जैसे शिव रहस्य, ऋग्वेद, यजुर्वेद, मठाम्नाय सेतु महानुशासनम और माधवाचार्य के शंकर दिग्विजय पर आधारित है। उन्होंने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को तीन अन्य शंकराचार्यों (शारदा मठ गुजरात, श्रींगेरी मठ मैसूर और गोवर्धन मठ पुरी) और भारत धर्म महामंडल का समर्थन प्राप्त है।
अदालती कार्यवाहियां और चुनौतियां
पत्र में कई अदालती मामलों का जिक्र है, जो अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की वैधता को साबित करते हैं:
गुजरात हाई कोर्ट में गोविंदानंद सरस्वती द्वारा दाखिल स्पेशल सिविल एप्लीकेशन नंबर 9878/2025 (वसीयत को फर्जी बताते हुए) को 2 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में सिविल अपील नंबर 3010/2020 और 3011/2020 लंबित हैं। 21 सितंबर 2022 के आदेश में अदालत ने अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की नियुक्ति को रिकॉर्ड पर लिया और अन्य पीठों के समर्थन का उल्लेख किया।
सुप्रीम कोर्ट के 14 अक्टूबर 2022 के अंतरिम आदेश (जिसमें पट्टाभिषेक पर रोक लगाई गई) को अप्रभावी बताया गया, क्योंकि स्थापना पहले ही हो चुकी थी। पत्र में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती पर झूठे दस्तावेज पेश करने का आरोप लगाया गया है, और उनके खिलाफ पेरजुरी की कार्यवाही की मांग की गई है।
दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल मानहानि मुकदमा (सीएस (ओएस) नंबर 640/2024) में गोविंदानंद सरस्वती की याचिका को वापस लेना पड़ा, और अदालत ने 18 दिसंबर 2025 को इसे निपटाया।
सुप्रीम कोर्ट के 4 अक्टूबर 2018 के आदेश में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य मान्यता दी गई, और उनके उत्तराधिकारी के रूप में अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को वैध ठहराया गया।
वकील ने आरोप लगाया कि प्राधिकरण का नोटिस सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में हस्तक्षेप है और यह मानहानि का मामला बनता है। इससे मुवक्किल की प्रतिष्ठा, सम्मान और आर्थिक स्रोतों को नुकसान पहुंचा है। साथ ही, मेला प्रशासन पर फर्जी शंकराचार्यों (जैसे स्वामी नरेंद्रानंद सरस्वती और अधोक्षजानंद देव तीर्थ) को सुरक्षा और जगह देने का आरोप लगाया गया है, जबकि अदालत ने ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
मांग और चेतावनी
पत्र में प्राधिकरण से 24 घंटे में नोटिस वापस लेने की मांग की गई है। असफल रहने पर अवमानना याचिका, मानहानि मुकदमा और 10 करोड़ रुपये के हर्जाने की मांग की जाएगी। वकील ने कहा, “यह नोटिस मीडिया और समाज में गलत धारणा पैदा कर रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने मुवक्किल की नियुक्ति को अमान्य किया है, जो झूठा है।”









